आईएसटीपी का खेल और राजस्व की लूट: मोबाइल का जिन्न खोलेगा बालू सिंडिकेट का राज

- पास के नाम पर सेटिंग, सरकार को हर महीने करोड़ों की चोट
- बिना आईएसटीपी ट्रकों की एंट्री ने खोली सिस्टम की पोल
रिपोर्ट : संजय चाणक्य कुशीनगर। पडोसी राज्य बिहार सीमा से सटे सूबे के कुशीनगर जिले में चल रहे मोरंग और बालू के कथित अवैध कारोबार की असली पटकथा सड़कों पर नहीं, बल्कि मोबाइल फोन के भीतर छिपी बताई जा रही है। चर्चा-ए-सरेआम है कि अगर इस पूरे मामले में शामिल कथित इंट्री माफियाओं, खनन विभाग के जिम्मेदार लोगों, चालक जितेंद्र, मुंशी सतीश और संबंधित थाना क्षेत्रों के पुलिसकर्मियों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन हिस्ट्री और मोबाइल चैट्स की निष्पक्ष जांच करा दी जाए, तो करोड़ों रुपये के राजस्व चोरी के इस खेल का पूरा “डिजिटल साम्राज्य” बेनकाब हो ज सकता है। सूत्रों का दावा है कि बिना आईएसटीपी के ट्रकों को यूपी सीमा में दाखिल कराने का खेल किसी सड़कछाप अवैध धंधे की तरह नहीं, बल्कि एक “संगठित नेटवर्क” की तरह संचालित होता है। बिहार सीमा से ट्रक निकलने के पहले ही मोबाइल फोन घनघनाने शुरू हो जाते थे। किस रास्ते से ट्रक आएगी, किस चौकी पर कौन ड्यूटी में है, कहां चेकिंग सख्त है, किसे फोन करना है, किसे “सेट” करना है और किस गाड़ी को किस थाना क्षेत्र से सुरक्षित निकालना है यह पूरा खेल मोबाइल नेटवर्क के जरिए ऑपरेट होने की चर्चा है।
बॉर्डर पार कराने का डिजिटल कंट्रोल रूम
जिले मे इस बात की चर्चा जोरो पर है कि बॉर्डर पर ट्रकों की इंट्री कराना किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं है। इसके लिए एक पूरा चैन सिस्टम काम करता है। ट्रक बिहार से निकलती, फोन बहादुरपुर बॉर्डर तक पहुंचता, वहां से सूचना आगे के थाना क्षेत्रों में जाती और फिर “क्लियरेंस” के हिसाब से ट्रकें जिले मे आगे बढ़ती है।स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार बॉर्डर पर चेकिंग दिखाने के लिए कुछ ट्रकों को रोका जाता है, लेकिन जिनकी “लाइन सेट” होती है, वह बेखौफ बिना आईएसटीपी के भी बडी आसानी से आगे बढ जाती है। यही वजह है कि जब बहादुरपुर चौकी पर सघन जांच चल रही थी, तब भी ट्रकें तमकुहीराज, सेवरही और पटहेरवा क्षेत्र की सडको पर दौड तक रही थीं।अब सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सा अदृश्य नेटवर्क था जो सीमा से लेकर अंदरूनी थाना क्षेत्रों तक ट्रकों को “ग्रीन कॉरिडोर” उपलब्ध करा रहा था?
करोड़ों का हिसाब छिपा है कॉल डिटेल में
जानकारों का कहना है कि यदि जांच एजेंसियां सिर्फ पिछले एक महीने का मोबाइल डेटा खंगाल लें, तो कई बड़े खुलासे संभव हैं। कौन व्यक्ति किस समय किस अधिकारी या कर्मचारी के संपर्क में था, ट्रक पकड़ने से पहले और बाद में किन-किन नंबरों पर बातचीत हुई, किन स्थानों पर आरोपी और विभागीय लोग बार-बार मौजूद रहे यह सब काल डिटेल रिकार्ड और लोकेशन मैपिंग से सामने आ सकता है।
सूत्र बताते हैं कि मुकदमे में नामजद कुछ कथित इंट्री ऑपरेटरों की बातचीत नियमित रूप से विभागीय कर्मचारियों और थाना क्षेत्रों के कुछ जिम्मेदार लोगों से होने की चर्चा है। यदि यह तथ्य तकनीकी जांच में सही साबित हुए, तो मामला सिर्फ अवैध खनन का नहीं बल्कि “संरक्षित राजस्व चोरी” के बड़े नेटवर्क में तब्दील हो सकती है।
चर्चा मे है ड्राइवर और मुंशी की भूमिका
पूरे मामले में खनन विभाग के चालक जितेंद्र और मुंशी सतीश का नाम इलाके में सबसे ज्यादा चर्चा में है। आरोप है कि विभाग के अंदर और बाहर के लोगों के बीच संपर्क का बड़ा माध्यम यही दोनो है। ट्रक किस समय निकलेगी, कहां रोकी जाएगी, किसे छोड़ना है और किसे पकड़ना है ऐसी सूचनाओं का आदान-प्रदान इन्हीं के जरिए होने की चर्चाएं जोरों पर हैं।स्थानीय लोगो का कहना है कि अगर इन दोनों के मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच हो जाए तो पूरा खेल मिनट-दर-मिनट खुल सकता है। कौन-कौन नंबर लगातार संपर्क में थे, किस थाना क्षेत्र में लोकेशन बार-बार मिली और किन समयों पर संदिग्ध गतिविधियां हुईं यह सब जांच की दिशा बदल सकता है।
मुकदमे के बाद भी सक्रिय रहे आरोपी?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ, क्या वह लोग मुकदमे के बाद भी पुलिस और विभागीय लोगों के संपर्क में थे या है? चर्चा है कि कुछ आरोपी मुकदमा दर्ज होने के बाद भी संबंधित थाना क्षेत्रों में खुलेआम घूमते और जिम्मेदार लोगों से मिलते देखे गए। यह सही है, तो फिर सवाल यह भी उढता है कि क्या कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए की गई है? क्या छोटे लोगों को पकड़कर असली नेटवर्क को बचाने की कोशिश हो रही है ? ऐसे मे यह जरूरी है कि इन लोगो का मोबाइल लोकेशन और कॉल रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
एसपी के एक्शन के बाद सिस्टम चोक में
तरया सुजान थानाध्यक्ष और बहादुरपुर चौकी प्रभारी के निलंबन के बाद पुलिस महकमे मे हड़कंप मच गया है। चर्चा है कि पुलिस अधीक्षक केशव कुमार के सख्त तेवर देख अब खनन व पुलिस विभाग के संलिप्त लोग अपना मोबाइल बदलने, चैट डिलीट करने और पुराने संपर्क मिटाने में जुट गये हैं। सूत्रों का दावा है कि जांच एजेंसियों ने डिजिटल एविडेंस को गंभीरता से लिया, तो यह मामला सिर्फ ट्रकों की अवैध इंट्री तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पुलिस, खनन विभाग और कथित इंट्री नेटवर्क के बीच संबंधों की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है। अब देखना दिलचस्प है कि क्या इस मामले में सिर्फ छोटी मछलियों पर कार्रवाई होगी या फिर मोबाइल डेटा के जरिए जांच एजेंसियां पर्दे के पीछे शराफत का नकाब लगाये खडे उन बडे चेहरों के गिरेहबान तक पहुंचेगी जिनके संरक्षण में यह करोड़ों का खेल चलता रहा? स्थानीय लोगो का कहना है कि अगर सच में सरकार राजस्व चोरी रोकना चाहती है, तो सिर्फ ट्रक पकड़ने से कुछ नहीं होगा। असली खेल मोबाइल के भीतर छिपा है। जिस दिन कॉल डिटेल और लोकेशन हिस्ट्री की परतें खुलेगी, उस दिन बालू सिंडिकेट का ऐसा सच सामने आ सकता है जिससे पूरा सिस्टम हिल जाएगा।
क्या है आईएसटीपी
जानकर बताते है कि जब कोई खनिज पदार्थ जैसे बालू, मोरंग, गिट्टी आदि एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाया जाता है, तो उसके लिए खनन विभाग द्वारा जारी ” वैध ट्रांजिट पास” अनिवार्य होता है। यही पास आईएसटीपी कहलाता है, जो यह सुनिश्चित कर्ता है कि खनिज वैध रूप से खनन किया गया है और सरकार को मिलने वाला रॉयल्टी और टैक्स जमा हुआ है। आईएसटीपी (वैध ट्रांजिट पास) अवैध खनन और राजस्व चोरी पर प्रतिबंध लगाने का एक महत्वपूर्ण कागजी अस्त्र है। जानकारों का कहना है किआमतौर पर इस पास में वाहन नंबर
खनिज का प्रकार (बालू/मोरंग आदि)मात्रा (कितने घनमीटर/टन)
खदान का नाम, गंतव्य स्थान, वैधता अवधि,
ऑनलाइन क्यूआर कोड या ट्रांजिट नंबर आदि विवरण दर्ज होता है। इतना ही नही यदि कोई ट्रक बिना आईएसटीपी के दूसरे राज्य में खनिज लेकर प्रवेश करते हुए पकड़ा जाता है, तो उस पर जुर्माना,वाहन सीज, राजस्व वसूली,और की धाराओं में मुकदमा दर्ज करने का प्राविधान है।
🔴 रिपोर्ट – संजय चाणक्य







