यूपी – ‘एक जिला-एक नदी’ योजना का सच: जहां मंत्री ने लगाया था पौधा, वहां अब निशान तक नहीं; ग्राउंड रिपोर्ट में खुलासा – INA

उत्तर प्रदेश में सरकार ने नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन के उद्देश्य से ‘एक जिला-एक नदी’ योजना शुरू की है। इस योजना में सीतापुर की सरायन नदी भी शामिल है। इस नदी के जीर्णोद्धार समिति के सदस्य और बीबीएयू के प्रो. वेंकटेश दत्ता के रेस्टोरेशन प्लान के तहत पिछले साल कैंची पुल के नीचे विश्व पर्यावरण दिवस यानी 5 जून 2025 को पौधरोपण अभियान की शुरुआत की गई थी। सरायन नदी के किनारे पर कारागार राज्य मंत्री सुरेश राही और नगर विकास राज्य मंत्री राकेश राठौर गुरु ने पौधा लगाकर ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की शुरुआत की थी।
तब सीतापुर वन प्रभाग ने एक विशेष पौधरोपण अभियान व प्लास्टिक प्रदूषण मुक्त थीम के तहत सरायन नदी का सफाई अभियान चलाया। इसमें नगर पालिका परिषद सीतापुर, जिला गंगा समिति, सामाजिक वानिकी वन प्रभाग व स्वयंसेवी संस्थाओं ने सक्रिय भागीदारी निभाई थी। उस समय के जिलाधिकारी ने सरायन की सफाई और नगर को प्लास्टिक मुक्त करने का संकल्प दिलाया था। इस अभियान का उद्देश्य नदी के सौंदर्य में वृद्धि करना और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र जीवित करना। जिससे भूमि कटाव को रोका जा सके और नदी के जल स्तर को बनाए रखने में भी मदद मिले।
पौधा तो दूर उसके अवशेष भी देखने को नहीं मिले
ठीक एक साल एक महीने बाद जब हम कैंची पुल के नीचे पौधरोपण वाली जगह पर पहुंचे तो नजारा कुछ और ही था। वहां एक भी पौधा तो दूर उसके अवशेष भी देखने को नहीं मिले। लगा ही नहीं कि यहां कभी पौधरोपण भी हुआ था। वहीं सीवर का गंदा पानी नदी में गिर रहा था। पास ही लोग नदी किनारे शौच के लिए जा रहे थे। यह हाल तो शहर के बीचोबीच का है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी जगह क्या स्थिति होगी।
कोई बताए कहां गए पौधे
पूर्व नगर पालिका परिषद अध्यक्ष आशीष मिश्र कहते हैं कि नदी शासकीय और प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है। बदहाली का प्रमुख कारण कब्जा, चीनी मिलों और फैक्टरियों का केमिकल युक्त पानी। शहर में एक भी एसटीपी नहीं है। शहर में लाखों पौधे लगाने का रिकॉर्ड बना था। इसमें नदी का किनारा भी शामिल था। वह कहां गए, इसका पता लगाना चाहिए।
सरकार साथ देती तो सरायन फिर से बहने लगती
वर्ष 2017 में सीतापुर से पूर्व भाजपा विधायक और अब कांग्रेस सांसद राकेश राठौर ने निजी खर्चे से सरायन की सफाई का जिम्मा संभाला। उन्होंने जेसीबी से किनारों को सही कराया। इसके बाद फिर सरायन को अविरल धारा मिली। बंद जलस्रोत फूट पड़े। कई सामाजिक संस्थाओं ने भी सहयोग किया। लेकिन यह काम राजनीतिक बवंडर में उलझकर बंद हो गया।
राकेश राठौर बताते हैं कि उस समय अपने पास से करीब 14.5 लाख से पोकलैंड मशीन खरीदी थी। बालू के स्तर तक साफ किया गया। सिल्ट निकाली गई। अपनी निधि से तीन स्थानों पर जाली लगाकर नगर पालिका के नालों को गिरने से रोका था। एक स्थान पर 20 लाख खर्चकर निजी जाली लगवाई थी। यह काम काफी महंगा था, इसमें जरूरी मदद सरकार से नहीं मिल पाई थी। इस वजह से काम रोकना पड़ा था। दोबारा सरायन को उसके वास्तविक स्वरूप में लाने का प्रयास किया जाएगा।